युवाओं को राजनीति में आने से आयेंगे बदलाव
आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां से किस तरफ जाएंगे, यह समझ में नहीं आ रहा। देश में 18 से 35 साल के युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय संसाधन मान रहे हैं। अगर इन युवाओं को सही दिशा मिले, तो यह संसाधन हैं, अन्यथा आक्रोश और खीझ से भरी यह आबादी देश के नीति-नियंताओं के लिए मुसीबत बन सकती है। इसलिए आने वाले वक्त को लेकर थोड़ा डर भी लगता है। युवाओं के पास रोजगार नहीं है। अच्छी शिक्षा नहीं है। कोई रोल मॉडल नहीं है। उन्हें कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही है।एक पार्टी अपने युवराज को प्रधानमंत्री पद का ताज देना चाहती है, लेकिन वह इस कुर्सी के लिए तैयार नहीं हैं। सवाल यह है कि अगर वह तैयार नहीं हैं, तो मैदान से हटते क्यों नहीं। किसी और को मौका क्यों नहीं देते? देश संभालने का जिम्मा उसी आदमी को मिलना चाहिए, जिसमें दम हो, जोश हो, जुनून हो। दूसरी तरफ एक ऐसे नेता हैं, जो नफरत की राजनीति के सहारे दिल्ली के तख्त पर काबिज होना चाहते हैं। वह इन युवाओं के गुस्से को भुनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं।
इन हालात में लगता है कि देश खतरनाक मोड़ पर है। सच कहें, तो ऐसी असहिष्णुता इससे पहले शायद ही पहले कभी देखी गई हो। आज अगर आप किसी नेता के विरोध में फेसबुक पर कोई बातें लिख दें, तो एक पूरा गैंग आपको घेर लेता है। वह आपके साथ गाली-गलौज पर भी उतर सकता है। दरअसल, यह मौजूदा सत्ता के खिलाफ गुस्सा भी है और उस गुस्से को भुनाने के लिए किसी भी हद तक जाने वालों का समर्थन भी। हमारी असली दिक्कत राजनीति में मध्यवर्ग का न होना है। ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों की बात करें, तो वहां हालात अलग हैं। वहां मध्यवर्ग के लोग राजनीति में आए, तो उन्होंने काफी कुछ बदला। मारग्रेट थैचर को ही ले लें, तो उनके पिता किराने की दुकान चलाते थे। हमारे यहां मध्यवर्ग के लोग हर क्षेत्र में सामने आ रहे हैं सिवाय राजनीति के। राजनीति में लोकतंत्र के नाम पर वंशतंत्र ने जगह बना ली है। ज्यादातर उच्च वर्ग वाले लोग राजनीति में सक्रिय हैं।बाकी जगह माफियाओं और अपराधियों ने ले ली है। तभी हमारे देश में लंबे वक्त को ध्यान में रखकर फैसले नहीं लिए जाते। राजनेता बमुश्किल पांच साल के बारे में सोचते हैं। अलग राज्य के रूप में तेलंगाना केवल इसलिए बनाया गया, ताकि 2014 के चुनाव में फायदा उठाया जा सके। इस फैसले के दूरगामी परिणामों की किसी को कोई फिक्र नहीं है।
आज कॉरपोरेट जगत हर तरफ अपनी पैठ बढ़ा रहा है। कॉरपोरेट सोशल रेसपॉन्सबिलिटी के नाम पर वे लोग एनजीओ बना रहे हैं। वे हमारी विकास योजनाओं में पैठ बना रहे हैं। इस तरह उनकी नजर हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर है। वे इस रास्ते हमारी नीतियों को प्रभावित कर रहे हैं। जबकि कॉरपोरेट का काम मूल रूप से मुनाफा कमाने और उसे अपने शेयर होल्डरों में बांटने तक ही सीमित रहना चाहिए था।
वास्तव में हमारे देश में लोकतंत्र लगातार कमजोर हो रहा है। आज जब सर्वोच्च न्यायालय किसी बात पर सरकार को फटकार लगाता है, तो आम आदमी बहुत खुश होता है। वह शीर्ष अदालत की तरफ उम्मीद की नजर से देखने लगता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
फेसबुक और ट्वीटर पर अपना गुस्सा निकालने वालों को इस हकीकत से भी रूबरू होना चाहिए कि 127 करोड़ की आबादी वाले देश में केवल आठ करोड़ लोग फेसबुक पर हैं। केवल दो करोड़ लोगों के ही ट्वीटर अकाउंट हैं। देश की कुल ग्रामीण आबादी में से महज दो फीसदी इंटरनेट से जुड़ी है। और यह भी बताने की जरूरत नहीं कि ग्रामीण इलाकों में बिजली कितने घंटे रहती है।
ऐसे में सिर्फ फेसबुक और ट्वीटर पर जंग लड़ने का कोई फायदा नहीं है। अब वक्त आ गया है कि हमारे युवा वर्चुअल दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में आएं और राजनीति से भी जुड़ें। तभी बदलाव की उम्मीद जगेगी और इस निराशा से आजादी भी मिल सकेगी..
इन हालात में लगता है कि देश खतरनाक मोड़ पर है। सच कहें, तो ऐसी असहिष्णुता इससे पहले शायद ही पहले कभी देखी गई हो। आज अगर आप किसी नेता के विरोध में फेसबुक पर कोई बातें लिख दें, तो एक पूरा गैंग आपको घेर लेता है। वह आपके साथ गाली-गलौज पर भी उतर सकता है। दरअसल, यह मौजूदा सत्ता के खिलाफ गुस्सा भी है और उस गुस्से को भुनाने के लिए किसी भी हद तक जाने वालों का समर्थन भी। हमारी असली दिक्कत राजनीति में मध्यवर्ग का न होना है। ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों की बात करें, तो वहां हालात अलग हैं। वहां मध्यवर्ग के लोग राजनीति में आए, तो उन्होंने काफी कुछ बदला। मारग्रेट थैचर को ही ले लें, तो उनके पिता किराने की दुकान चलाते थे। हमारे यहां मध्यवर्ग के लोग हर क्षेत्र में सामने आ रहे हैं सिवाय राजनीति के। राजनीति में लोकतंत्र के नाम पर वंशतंत्र ने जगह बना ली है। ज्यादातर उच्च वर्ग वाले लोग राजनीति में सक्रिय हैं।बाकी जगह माफियाओं और अपराधियों ने ले ली है। तभी हमारे देश में लंबे वक्त को ध्यान में रखकर फैसले नहीं लिए जाते। राजनेता बमुश्किल पांच साल के बारे में सोचते हैं। अलग राज्य के रूप में तेलंगाना केवल इसलिए बनाया गया, ताकि 2014 के चुनाव में फायदा उठाया जा सके। इस फैसले के दूरगामी परिणामों की किसी को कोई फिक्र नहीं है।
आज कॉरपोरेट जगत हर तरफ अपनी पैठ बढ़ा रहा है। कॉरपोरेट सोशल रेसपॉन्सबिलिटी के नाम पर वे लोग एनजीओ बना रहे हैं। वे हमारी विकास योजनाओं में पैठ बना रहे हैं। इस तरह उनकी नजर हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर है। वे इस रास्ते हमारी नीतियों को प्रभावित कर रहे हैं। जबकि कॉरपोरेट का काम मूल रूप से मुनाफा कमाने और उसे अपने शेयर होल्डरों में बांटने तक ही सीमित रहना चाहिए था।
वास्तव में हमारे देश में लोकतंत्र लगातार कमजोर हो रहा है। आज जब सर्वोच्च न्यायालय किसी बात पर सरकार को फटकार लगाता है, तो आम आदमी बहुत खुश होता है। वह शीर्ष अदालत की तरफ उम्मीद की नजर से देखने लगता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
फेसबुक और ट्वीटर पर अपना गुस्सा निकालने वालों को इस हकीकत से भी रूबरू होना चाहिए कि 127 करोड़ की आबादी वाले देश में केवल आठ करोड़ लोग फेसबुक पर हैं। केवल दो करोड़ लोगों के ही ट्वीटर अकाउंट हैं। देश की कुल ग्रामीण आबादी में से महज दो फीसदी इंटरनेट से जुड़ी है। और यह भी बताने की जरूरत नहीं कि ग्रामीण इलाकों में बिजली कितने घंटे रहती है।
ऐसे में सिर्फ फेसबुक और ट्वीटर पर जंग लड़ने का कोई फायदा नहीं है। अब वक्त आ गया है कि हमारे युवा वर्चुअल दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में आएं और राजनीति से भी जुड़ें। तभी बदलाव की उम्मीद जगेगी और इस निराशा से आजादी भी मिल सकेगी..
केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड जन संचार विभाग छात्र
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