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Showing posts from January, 2022

राजनीति में युवाओं का दखल जरूरी

युवाओं ही राजनीतिक में कर सकते बदलाव  कुणाल कुमार ✍️ भारत में प्रजातंत्र शब्द का मतलब विरोधाभाषी होता जा रहा है। चुनाव और पद मिलने के बाद जिम्मेदार आगे बढ़ रहे हैं और जनता पीछे छूट रही है। ऐसा सालों से चल रहा है। सत्ता हासिल करने के बाद जनता की भावनाएं नेताओं के लिए कोई महत्व नहीं रखती है। इसके कारण समाज भी पिछड़ता जा रहा है। पहले के नेता समाज में मूल्यों के लिए जीते थे और अब इसके मायने बदल रहे हैं। इसके कारण युवाओं को इसके प्रति ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है। हर छोटी और बड़ी घटनाओं पर मंथन करें तो सामने आता है कि ऐसा जिम्मेदारों के समाज से कट जाने के कारण होता है। यह भी हैरानी की बात है कि शिक्षा व्यवस्था में प्रजातंत्र जैसी बातों को काफी कम महत्व दिया जाता है। इसके कारण लोगों इसके प्रति ज्ञान का अभाव भी समाज को कमजोर बना रहा है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि वे युवा जो नई सोच रखते हैं। समाज को आगे लेकर जाने की इच्छाशक्ति रखते हैं और ईमानदारी से वह सबकुछ करने का जिससे समाज समाज में बदलाव आए उन्हें उन्हें आगे आना चाहिए। युवा ही इसकी दिशा बदल सकते हैं। अच्छी पढ़ाई और ज्ञानवान यूथ को इसके ...

युवाओं को राजनीति में आने से आयेंगे बदलाव

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आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां से किस तरफ जाएंगे, यह समझ में नहीं आ रहा। देश में 18 से 35 साल के युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय संसाधन मान रहे हैं। अगर इन युवाओं को सही दिशा मिले, तो यह संसाधन हैं, अन्यथा आक्रोश और खीझ से भरी यह आबादी देश के नीति-नियंताओं के लिए मुसीबत बन सकती है। इसलिए आने वाले वक्त को लेकर थोड़ा डर भी लगता है। युवाओं के पास रोजगार नहीं है। अच्छी शिक्षा नहीं है। कोई रोल मॉडल नहीं है। उन्हें कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही है।एक पार्टी अपने युवराज को प्रधानमंत्री पद का ताज देना चाहती है, लेकिन वह इस कुर्सी के लिए तैयार नहीं हैं। सवाल यह है कि अगर वह तैयार नहीं हैं, तो मैदान से हटते क्यों नहीं। किसी और को मौका क्यों नहीं देते? देश संभालने का जिम्मा उसी आदमी को मिलना चाहिए, जिसमें दम हो, जोश हो, जुनून हो। दूसरी तरफ एक ऐसे नेता हैं, जो नफरत की राजनीति के सहारे दिल्ली के तख्त पर काबिज होना चाहते हैं। वह इन युवाओं के गुस्से को भुनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं। इन हालात में लगता है कि देश खतरनाक मोड़ पर है। सच कहें, तो ऐसी असहिष्णुता इससे पहले शायद ही पह...

राजनीति निष्कर्ष के संभावनाये

कुणाल कुमार ✍️ आज भारत का हर नागरिक भली-भांति अपना अच्छा बुरा समझता है। युवाओं को संप्रदायवाद तथा राजनीति से परे अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। युवाओं को इस मामले में एकदम सोच समझकर आगे बढ़ना होगा। और ऐसी किसी भी भावना में न बहकर सोच समझकर निर्णय लेना होगा। भारत का युवा वर्ग वाकई में समझदार है जो सच में इस मामले में एक है और ज्यादातर युवावर्ग राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मान रहा है। यह वाकई में एक अच्छी और सकारात्मक बात है जो भारत जैसे देश के लिए बड़ी बात है। और भी चीजें है जैसे बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में जगह पाने की लिए रिश्वत जैसी बातें भी कारण है युवा को देश से दूर करने के लिए। इसीलिए हमें समय-समय पर अपने युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा। जिससे कि वे सही और गलत में पहचान कर सकें तथा अपने देश को आगे तथा तरक्की के मार्ग पर ले जाने में सहयोग प्रदान कर सकें।

राजनीतिक के बदलते माहौल

कुणाल कुमार ✍️ आज के युवाओं को सिर्फ और सिर्फ टारगेट ओरियेंटेड बना दिया गया है मतलब यह है कि आजकल के माता-पिता स्वंय नहीं चाहते कि उनका पुत्र या पुत्री अपने कार्यो के अलावा देश के सामाजिक कार्यो में भी अपना योगदान दें क्योंकि आजकल का माहौल ही कुछ इस तरह का हो गया है कि सब केवल अपना भविष्य बनाने में लगे हुए हैं। यहां तक कि आजकल के युवाओं को उनके परिवार के प्रति जिम्मेदारी का एहसास तक नहीं होता इसलिए हमें इसके लिए कई ठोस कदम उठाने होंगे। राजनीति में आज वृद्ध लोगों का ही बोलबाला है और चंद गिने-चुने युवा ही राजनीति में है। इसका एक कारण यह है कि बिहार में राजनीति का माहौल दिन-ब-दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीतिक लोगों की जगह सत्तालोलुप और धन के लालची लोगो ने ले ली है। राजनीति में देश प्रेम की भावना की जगह परिवारवाद, जातिवाद और संप्रदाय ने ले ली है। आए दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे है देश के युवा वर्ग में राजनीति के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। अब भारत की राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस, शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक जैसे युवा नेता आज नहीं है। जो अपने ...

युवा और राजनीतिक चेतना में भूमिका का प्रभाव

कुणाल कुमार ✍️ हम सब जानते हैं कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। आज भारत में दूसरे देशों से सबसे ज्यादा युवा बसते हैं। युवा वर्ग वह वर्ग होता है जिसमें 14 वर्ष से लेकर 40 वर्ष तक के लोग शामिल होते हैं। आज भारत देश में इस आयु के लोग सबसे बड़ी संख्या में मौजूद है। यह एक ऐसा वर्ग है जो शारीरिक एवं मानसिक रूप से सबसे ज्यादा ताकतवर है। जो देश और अपने परिवार के विकास के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं। आज भारत देश में 75% युवा पढ़ना लिखना जानता है। आज भारत ने अन्य देशों की तुलना में अच्छी खासी प्रगति की है। इसमें सबसे बड़ा योगदान शिक्षा का है। आज भारत का हर युवा अच्छी से अच्छी शिक्षा पा रहा है। उन्हें पर्याप्त रोजगार के अवसर मिल रहे हैं परंतु दुख की बात यह है कि आज का युवा भले ही कितना ही पढ़ लिख गया हो परंतु अपने संस्कार व देश और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को दिन-प्रतिदिन भूलता ही जा रहा है। आज भारत का युवा वर्ग ऊंचाईयों को छूना चाहता है परंतु वह यह भूलता जा रहा है कि उन ऊंचाईयों को छूने के लिए वह स्वयं अपनी जड़ें खुद काट रहा है। भारत का युवा वर्ग तैयार है एक नई युवा क्रांति के लिए। लेकिन अफसोस ...

बिहार की राजनीतिक अन्तर जातीय से बिखरता विकास

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कुणाल कुमार ✍️ बिहार में जाति बहुत ही महत्वपूर्ण रही है। यह सच है कि यहां की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द ही सीमित रही है। इसके एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं। फ़िर चाहे वह पूर्व मुख्यमंत्री श्री लालू यादव जी हों या फ़िर आज के नीतीश कुमार जी ।आज कल बिहार में एक शब्द की पुनरावृति बार-बार हो रही है " महादलित " । वास्तव में ये महा दलित कौन हैं ? मैं यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ये विशुद्ध राजनीतिक शब्द है "सेक्यूलर (धर्म-निरपेक्षता) की तरह । वास्तव में महादलित शब्द नीतिश कुमार जी की देन है परन्तु खेद इस बात का है की जो कार्य महादलित के नाम पे हो रहा है क्या वो हमारे समाज को विघटन की ओर नहीं ले जा रहा है ? वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाया गया हथकंडा सामाजिक विषमताओं को जन्म दे रहा है और समरसता और सदभाव जैसे शब्दों की खिल्ली भी उड़ा रहा है। ये सच है की बिहार में जातिवाद है और इसके लिए अगर कोई जिम्मेवार है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीतिज्ञ । दलित जातियों को दो फ़ाड़ में बांटकर उनकी एकता को विखंडित कर नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति को नयी धार दी। बिहार में दलित जाति के तहत कुल 23 उपजातियां हैं। ...